कफील खान का भाषण हिं’सा भ’ड़का’ने वाला नहीं, एकता का संदेश: हाई कोर्ट

प्रयागराज : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि कफील खान का भाषण सरकार की नीतियों का विरोध था. उनका बयान नफ’रत या हिं’सा को बढ़ा’वा देने वाला नहीं बल्कि राष्ट्रीय एकता और अखंडता का संदेश देने वाला था. इस निष्कर्ष पर पहुंचते हुए कोर्ट ने कहा कि कफील खान को तुरंत रिहा किया जाए

डॉक्टर कफील खान. एक ऐसा डॉक्टर, जो गोरखपुर में ऑक्सीजन सप्लाई की कमी के चलते छोटे बच्चों की मौत की घटना के बाद चर्चा में आया. एक ऐसा डॉक्टर, जो अलीगढ़ में बड़े बच्चों के बीच भ’ड़का:ऊ भा’षण देने के आरोप में जेल गया. एक ऐसा डॉक्टर, जिसके ऊपर जेल से छूटने के दिन ही NSA जैसा दूसरा सं’गीन इ’ल्जाम लगा और बाहर नहीं आ पाया. इस डॉक्टर पर मंगलवार को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आदेश दिया और कहा कि NSA लगाना गैर-कानूनी है, लिहाजा डॉक्टर कफील को तुरंत रिहा किया जाए.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि कफील खान का भाषण सरकार की नीतियों का विरोध था. उनका बयान न’फरत या हिं’सा को बढ़ा’वा देने वाला नहीं बल्कि राष्ट्रीय एकता और अखंडता का संदेश देने वाला था. इस निष्कर्ष पर पहुंचते हुए कोर्ट ने कहा कि कफील खान को तुरंत रिहा किया जाए.

फिलहाल, कफील खान को कोर्ट के आदेश के बाद राहत मिल गई है. लेकिन कफील खान के सुर्खियों में रहने की कहानी काफी पुरानी है. डॉक्टर कफील का नाम सबसे पहले 2017 में चर्चा में आया था और तब से ही वो मुश्किलों में हैं.

बीआरडी अस्पताल की घटना से नाम सामने आया

एमडी की डिग्री लेने के बाद डॉक्टर कफील खान की नियुक्ति अगस्त 2016 में गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में हुई. मेडिकल कॉलेज के हास्पिटल में 10-11 अगस्त की रात अचानक ऑक्सीजन सप्लाई की कमी आ गई. बड़ी संख्या में ब’च्चों की मौ’त हो गई. हादसे के बाद बीआरडी के कई डॉक्टरों के खिलाफ क्रि’मि’नल केस दर्ज किया गया, जिसमें डॉक्टर कफील खान का नाम भी था. कफील खान को गि’रफ्तार कर जेल भेजा गया. सस्पेंड कर दिया गया. अप्रैल 2018 में कफील खान को बेल मिल गई.

बीआरडी केस में भी हुई थी कफील खान को जेल
CAA के विरोध में भ’ड़का’ऊ भा’षण का आरोप

दिसंबर 2019 में केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून पारित किया. इस कानून का देश के कई इलाकों में वि’रोध किया गया. कानून को ध’र्म के आ’धार पर पक्षपात करने वाला बताया गया. खासकर, मु’स्लिम स’मुदाय के लोग इस कानून के खिलाफ सड़कों पर उतर आए. दिल्ली की जामिया यूनिवर्सिटी से लेकर शाहीनबाग और अलीगढ़ मु’स्लिम यूनिवर्सिटी तक छात्र-छात्राएं, महिलाएं सड़कों पर उतर आए और कानून वापसी की मांग करने लगे.

12 दिसंबर को एक तरफ राष्ट्रपति ने सीएए को मंजूरी दी और दूसरी तरफ इसी दिन AMU में प्रदर्शन कर रहे छात्रों को योगेंद्र यादव और डॉक्टर कफील खान ने संबोधित किया. अगले ही दिन कफील खान के खिलाफ अलीगढ़ के सिविल लाइंस पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 153-ए के तहत केस दर्ज कर लिया गया. इसके बाद कुछ और धाराएं भी जोड़ दी गईं. कफील खान पर अपने भा’षण से न’फरत फै’लाने, बां’टने और सां’प्रदायिक सौ’हार्द बि’गा’ड़ने जैसे आरोप लगे. 29 जनवरी 2020 को डॉक्टर कफील खान की गिरफ्तारी मुंबई से हुई. यूपी लाकर कफील खान को मथुरा की जेल में रखा गया.

10 फरवरी को अलीगढ़ के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने कफील खान को 60 हजार की जमानत राशि के साथ बेल दे दी. बेल ऑर्डर के हिसाब से कफील खान को 13 फरवरी की सुबह 11 बजे मजिस्ट्रेट के सामने पेश होना था. लेकिन न ही कफील खान को रिहा किया गया और न ही मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया.

कफील खान पर लगा NSA

कफील खान की रिहाई होने वाले दिन ही अलीगढ़ पुलिस की तरफ से कफील खान पर NSA लगा दिया गया. पुलिस ने कहा कि गोरखपुर जिले के राजघाट का रहने वाला डॉक्टर कफील आपराधिक और सां’प्रदा’यिक प्र’कृति का व्यक्ति है. कफील खान ने सीएए और एनआरसी के मसले पर मु’स्लिम समु’दाय को भ’ड़का कर सौहार्द बिगाड़ने का काम किया है. कफील खान की गतिविधियों से डर और आ’तंक का मा’हौल है. इसके द्वारा जो कृत्य किए गए हैं वो पब्लिक ऑर्डर को खतरा पैदा करते हैं. डीआईजी अलीगढ़ ने इसकी सूचनी मजिस्ट्रेट को दी और कफील खान की रिहाई पर रोक लगाने की मांग की. 13 फरवरी को ही अलीगढ़ मजिस्ट्रेट ने कफील खान की न्यायिक हिरासत को जारी रखने का आदेश पारित कर दिया. इस तरह कफील खान जेल से बाहर नहीं आ पाए.

अलीगढ़ मजिस्ट्रेट ने क्या आधार माना

अलीगढ़ के मजिस्ट्रेट ने कफील खान की कस्टडी बढ़ाने वाले अपने आदेश में कफील खान के भा’षण के कुछ हिस्सों का जिक्र किया और उन्हें आधार मानते हुए अपना आदेश दिया. कोर्ट ने बताया कि 12 दिसंबर 2019 को शाम करीब 6.30 बजे AMU के बाब-ए सैयद गेट पर कफील खान ने यूनिवर्सिटी के करीब 600 छात्रों को संबोधित किया, भाषण में धा’र्मिक भा’वनाएं भ’ड़का’ने की कोशिश की. भाषण में कहा गया कि सीएए के जरिए मोटा भाई सिखाते हैं कि हम हिं’दू बनेंगे या मु’स्लिम बनेंगे, एनआरसी लागू होने के बाद हम दोयम दर्ज के नागरिक हो जाएंगे, आपको ये कहकर परेशान किया जाएगा कि आपके पिता के दस्तावेज सही नहीं हैं. ये अस्तित्व की लड़ाई है और हम इसे लड़ेंगे.

अलीगढ़ के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने अपने आदेश में ये भी कहा कि ऐसे बयानों के जरिए आपने (कफील खान) मु’स्लिम छात्रों के दिमाग में हिं’दू, सि’ख, ई’साई और पा’रसी स’मुदाय के खि’लाफ दु’श्मनी का भा’व पैदा करने की कोशिश की. मौके पर मौजूद पुलिसकर्मी और वीडियो रिकॉर्डिंग से ये साबित होता है कि उस दिन आपने लॉ एंड ऑर्डर बिगाड़ने की कोशिश की. इसका नतीजा ये हुआ कि 13 दिसंबर 2019 को AMU के करीब 10 हजार छात्रों ने अलीगढ़ शहर की तरफ मार्च किया. पुलिस ने इन्हें बहुत कोशिशों से रोका, अगर ऐसा नहीं होता तो कानून व्यवस्था बिगड़ जाती. इसके बाद 15 दिसंबर को रात करीब 8.30 बजे छात्रों ने बैरिकेड तोड़कर अलीगढ़ शहर में जाने की कोशिश की, जब उन्हें रोका गया तो पुलिस को टारगेट किया गया, प’त्थरबा’जी की गई, फा’यरिं’ग की गई. जिससे शहर में अफरा-तफरी मच गई और डर का माहौल पैदा हो गया.

हालांकि, कफील खान के पक्ष में बोलने वाले लोग लगातार कहते रहे हैं कि उनके भाषण में ऐसा कुछ नहीं था जो कानून व्यवस्था के लिए चुनौती हो. यहां कि कफील खान के उस वक्त मौजूद योगेंद्र यादव ने भी सार्वजनिक मंचों से कहा कि वो भा’षण भ,ड़काऊ नहीं था, बल्कि एक कानून के खि’लाफ आवाज उठाई जा रही थी. इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश में भी अलीगढ़ मजिस्ट्रेट के आधार को सेलेक्टिव बयानों की बुनियाद पर लिया गया फैसला बताया गया.

इलाहाबाद हाई कोर्ट का आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 1 सितंबर को दिए गए अपने आदेश में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं. कोर्ट ने कहा, एडिशनल एडवोकेट जनरल की तरफ से बताया गया है कि कफील खान जेल में रहते हुए भी AMU के छात्रों के संपर्क में हैं और अलीगढ़ का मौहाल खराब करने की कोशिश की जा रही है. कोर्ट ने कहा कि ये आरोप किसी तरह से साबित नहीं किया गया है इसलिए इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है. आदेश में कहा गया कि जेल में कोई डिवाइस नहीं रहती है जिससे किसी से संपर्क किया जाए और जेल में किसी मिलने वाले के जरिए संदेश पहुंचाने की बात भी रिकॉर्ड में नहीं है.

इसके अलावा इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, ”इसमें कोई शक नहीं है कि कस्टडी बढ़ाने के लिए भा’षण के जिन वाक्यों का इस्तेमाल किया गया है वो स्पी’च का हिस्सा हैं, लेकिन उनका संदर्भ अलग है. वक्ता (कफील खान) निश्चित रूप से सरकार की नीतियों का विरोध कर रहा था और ऐसे करते वक्त उसकी तरफ से कुछ उदाहरण जरूर दिए गए, लेकिन वो ऐसे नहीं कि कस्टडी में रखना पड़े.”

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने आदेश में सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, ”पूरा भाषण पढ़ने से पृथम दृष्टया कहीं जाहिर नहीं होता कि न’फरत या हिं’सा को बढ़ाने का प्रयास किया गया है. साथ ही इससे अलीगढ़ शहर की शांति को भी कोई चुनौती नहीं दिखाई देती है. भा’षण राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बढ़ावा देने वाला है. ऐसा लगता है कि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने भा’षण का कुछ हिस्सा पढ़ा और भाषण के असल मकसद को दरकिनार कर कुछ हिस्से वहां से ले लिए.

कोर्ट ने आदेश में कहा, ”13 फरवरी, 2020 को अलीगढ़ डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट द्वारा दिया गया आदेश, जो कि यूपी सरकार द्वारा भी कंफर्म किया गया था, रद्द किया जाता है. डॉक्टर कफील को जेल में रखना गैर-कानूनी करार दिया जाता है. उन्हें तुरंत रिहा किया जाए.”

इस तरह सात महीने बाद डॉक्टर कफील खान को जमानत मिल गई है और उनके बाहर आने का रास्ता साफ हो गया ह

(आजतक से साभार)

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