तुर्की म्यूजियम अब मस्जिद में तब्दील होगा – तैय्यब एर्दोगान

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आया सूफ़िया अब मस्जिद होगी तुर्की की आला अदालत ने मूतफक्का तौर पर 1935 में अतातुर्क काबीना का आयासूफ़िया को म्यूज़ियम में तब्दील करने का फ़ैसला मंसूख (रद्द) कर दिया
आयासूफ़िया अब सुल्तान मुहम्मद फ़ाते (र अ) के फ़रमान के मुताबिक़ मस्जिद होगी

सदर रजब तैयब एर्दोगन ने कहा था की आयासूफ़िया मस्जिद है की हैसियत की बहाली के लिए क़ानूनी कार्यवाई होगी

ये कहानी है एक अद्भुत इमारत की. एक 1500 बरस पुरानी इमारत. इतनी विशाल कि जो देखता, वो कहता ये दुनियावी नहीं. इसे ज़रूर फ़रिश्तों ने गढ़ा होगा. उस इमारत ने कई साम्राज्यों को ढलते देखा. देशों के नाम बदलते देखे. उसकी अपनी पहचान भी बदलती रही. कभी तो वो दुनिया का सबसे महान चर्च कहलाया. और कभी उसे कहा गया दुनिया की सबसे महान मस्जिद. कहते हैं, इसी इमारत की ख़ूबसूरती ने रूस को ईसाई बनाया. कहते हैं, इसके तहखानों में आज भी कई प्राचीन सुरंगें छुपी हैं. जितनी इस इमारत की उम्र है, उससे ज़्यादा इसकी कहानियां हैं. कहानियां ऐसी कि करीब साढ़े पांच सौ साल पहले गायब हुआ राजा एक दिन यहां वापस लौटेगा. भविष्यवाणियां ऐसी कि एक दिन इसी इमारत को लेकर शुरू होगा एक विशाल युद्ध. एक युद्ध, जो तुर्की का नामो-निशां मिटा देगा.।

ये किस इमारत की बात कर रहे हैं हम? इस इमारत का नाम है, अया सोफ़िया. इसकी लोकेशन है, तुर्की की राजधानी इस्तांबुल. ये इमारत ग्लोबल झगड़े का एक कारण बन रही है. इसे लेकर तुर्की और उसके पड़ोसी ग्रीस में ख़ूब टेंशन बढ़ गई है. इस इमारत को लेकर रूस और अमेरिका एक पाले में दिख रहे हैं. ये इमारत तुर्की बनाम क्रिश्चन्स का मामला बन रही है. और इस झगड़े की जड़ में हैं तुर्की के मौजूदा राष्ट्रपति, रिसेप तैयप एर्दोगान. वो ‘अया सोफ़िया’ को एक मस्जिद बनाना चाहते हैं. मस्जिद इसलिए ताकि आठ दशक पुरानी कट्टरपंथी मुसलमानों की एक बड़ी हसरत पूरी हो जाए. अगर ऐसा हुआ, तो दुनियाभर में ईसाइयों और मुसलमानों के बीच तनाव बढ़ सकता है।

अब सवाल है कि एक इमारत को लेकर इतना बवाल क्यों मचा है? ऐसा क्या ख़ास है अया सोफ़िया में कि इसे लेकर इतना आवेश है लोगों में? क्या है इस इमारत का अतीत? क्या है वो अतीत, जिसके कारण ये इमारत इस्लाम बनाम क्रिस्चैनिटी के सबसे बड़े प्रतीकों में गिनी जाती है? इन सवालों का जवाब छुपा है इतिहास में. वो इतिहास, जिसकी शुरुआत हमें लेकर जाएगी 1700 साल पुरानी दुनिया में ।

ऐसा चर्च जैसा न पहले कभी बना हो, न आगे कभी बन पाए
ये बात शुरू होती है रोमन सम्राट कॉन्स्टेनटिन प्रथम से. कॉन्स्टेनटिन प्रथम से पहले रोमन साम्राज्य में कई अलग-अलग देवताओं की पूजा होती थी. ढेर सारे कल्ट थे यहां. फिर कॉन्स्टेनटिन आए और उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया. अब क्रिश्चैनिटी बन गया रोमन साम्राज्य का आधिकारिक धर्म ।

इस समय रोमन साम्राज्य के दो हिस्से थे. एक पश्चिमी हिस्सा. जिसकी राजधानी थी, मेडिओलानुम. ये वहीं था, जहां अब इटली का मिलान शहर बसा है. साम्राज्य के पूर्वी हिस्से की राजधानी थी, बैजेन्टियम. सन् 330 में सम्राट कॉन्स्टेनटिन ने इसी बैजेन्टियम में बनाई अपनी नई राजधानी. इसका नाम रखा, कॉन्स्टेनटिनोपोल ।

सन् 360 की बात है. सम्राट कॉन्स्टेनटिन ने शहर में बनवाया एक चर्च. इसकी छतें लकड़ी की बनी थीं. 44 साल बाद सन् 404 में एक झगड़ा हुआ और ये चर्च जला दिया गया. 11 साल बाद इसी जगह पर नए सम्राट थियोडोसिओस ने बनवाया एक और चर्च. वो भी लकड़ी के छत वाला. करीब सौ साल बाद ये चर्च भी एक झगड़े में जला दिया गया. इस समय यहां सम्राट थे, एम्परर जस्टिनियानोस. उन्होंने भी ठीक उसी जगह पर एक नया चर्च बनवाने का फैसला किया. इसके लिए उन्होंने चुने उस जमाने के दो सबसे बड़े आर्किटेक्ट. इनके नाम थे- मिलेटस इज़िडोरोस और ट्रालेस एन्थेमियोस. सम्राट जस्टिनियानोस ने दोनों से कहा, मुझे ऐसा चर्च बनाकर दो जैसा न पहले कभी बना हो, न आगे कभी बन पाए।

इसी निर्देश के साथ दोनों आर्किटेक्ट ने मिलकर बनाया एक विशाल चर्च का नक्शा. जिसका निर्माण शुरू हुआ- 23 फरवरी, 532 को. करीब 10 हज़ार मज़दूर दिन-रात लगे रहे. उनकी पांच बरस की मेहनत के बाद सन् 537 में बनकर तैयार हुआ ये चर्च. एक विशाल गुंबद वाला चर्च. जिसकी ईंटें मंगवाई गई थीं उत्तरी अफ्रीका से. जिसके छत में लगा संगेमरमर मंगवाया गया सीरिया से. 269 फुट लंबा. 240 फुट चौड़ा. दो मंजिल वाला चर्च. जिसके बिचले हिस्से की दीवारों में लगे मोज़ैक के अंदर जड़ा था सोना, चांदी और बेशुमार कीमती पत्थर. 27 दिसंबर, 532 को जब सम्राट जस्टिनियानोस ने इस चर्च में पांव रखे, तो अवाक होकर उनके मुंह से निकला।

सम्राट जस्टिनियानोस जिन सोलोमन को पीछे छोड़ने की बात कर रहे थे, उनका ज़िक्र हिब्रू बाइबल में मिलता है. कहते हैं, उन्होंने ही प्राचीन जेरुसलम का फर्स्ट टेम्पल बनवाया था।

फिर से लौटते हैं सम्राट जस्टिनियानोस के बनवाए चर्च पर. जिसका नाम रखा गया- हाइया सोफ़िया. ये ग्रीक भाषा का शब्द है. ग्रीक में हाइया मतलब होता है पवित्र. और सोफ़िया माने, बुद्धि. विवेक. हाइया सोफ़िया का मतलब था- ईश्वर के पवित्र विवेक से जुड़ी धार्मिक जगह. ये चर्च ईसाई धर्म का सेंटर बन गई. पूरे बेजेन्टाइन साम्राज्य की सबसे मुख्य जगह. कॉन्स्टेनटिनोपोल का सबसे बड़ा प्रतीक. यहीं पर नए राजाओं का राज्याभिषेक होता. जिसे यहां प्रार्थना करने का मौका मिलता, वो ख़ुद को धन्य समझता।

अब कहानी को करते हैं थोड़ा फास्ट फॉरवर्ड. और चलते हैं 29 मई, 1453 की तारीख़ पर. क्या हुआ था इस दिन? इस दिन हुआ एक युद्ध का अंत. युद्ध, जिसमें एक तरफ था किले की ऊंची दीवारों के भीतर बंद कॉन्स्टेनटिनोपोल. ऐसी दीवारें, जिन्हें माना जाता था अभेद्य. कितने ही शासक इसे जीतने का मंसूबा लेकर आए. मगर किले की दीवार ज्यों-की-त्यों खड़ी रही. ऐसे में 6 अप्रैल, 1453 को जब एक 21 साल के सुल्तान ने कॉन्स्टेनटिनोपोल का घेराव किया, तो उसके अपने सिपहसालारों ने उसे पागल समझा. सबने सोचा, ये नया-नवेला सुल्तान भी मुंह की खाकर लौट जाएगा. उस सुल्तान ने कई बार मुंह की खाई भी. कभी उसकी तोपें फट गईं. कभी औचक हमलों में उसके सैकड़ों सैनिक मर गए. कभी दुश्मन के जहाज़ों ने उसके बेड़े डुबा दिए. मगर फिर भी वो डटा रहा. 52 दिनों की घेराबंदी के बाद आई ये 29 मई, 1453 की तारीख़. दिन, मंगलवार. रात के करीब डेढ़ बजे होंगे, जब उस एक छोटे से दरवाज़े से होकर उस सुल्तान के आख़िरी बचे सैनिक किले के भीतर घुसे. ये कॉन्स्टेनटिनोपोल का ख़ात्मा था.

कौन था ये सुल्तान? इस सुल्तान का नाम था, फतिह महमेद. ऑटोमन साम्राज्य का सुल्तान महमेद द्वितीय. जिसने कॉन्स्टेनटिनोपोल को जीतकर दुनियाभर के मुसलमानों का सपना पूरा किया था. कहते हैं कि सुल्तान महमेद ने पैगंबर मुहम्मद की भी भविष्यवाणी सही की थी. वो भविष्यवाणी, जिसमें प्रॉफ़ेट मुहम्मद ने कॉन्स्टेनटिनोपोल की तुलना की थी एक लाल सेब से. कहा था कि एक रोज़ एक मुसलमान राजा ये लाल सेब जीत लेगा.

जीतने के बाद क्या किया सुल्तान महमेद ने? उसने कॉन्स्टेनटिनोपोल को बनाई अपने ऑटोमन साम्राज्य की नई राजधानी. इसका नया नाम रखा गया- इस्तांबुल. और हाइया सोफ़िया, उसका क्या हुआ? ऑटोमन जीत के बाद उसका भी धर्मांतरण कर दिया. इसे तब्दील कर दिया गया एक मस्जिद में. अब हाइया सोफ़िया का नाम पड़ा- अया सोफ़िया.

सुल्तान महमेद ने हाइया सोफ़िया के डिज़ाइन में कई चीजें जोड़ीं. मसलन, मुख्य इमारत के बाहर करीब 60 मीटर ऊंची चार मीनारें. हाइया सोफ़िया के आर्किटेक्चर ने दुनियाभर की मस्जिदों को इतना प्रभावित किया कि आर्ट-ऐंड-आर्किटेक्चर में लोग अब इसपर शोध करते हैं. हाइया सोफ़िया के उस गुंबद वाले डिज़ाइन पर दुनियाभर में अनगिनत मस्जिदें बनाई गईं. ये गुंबद वाला डिज़ाइन इतना लोकप्रिय हो गया कि आज लोग इसे मस्जिदों का सबसे प्रचलित फीचर समझते हैं.

और ईसाइयों पर क्या असर हुआ इस बदलाव का? उन्होंने इसे अपना अपमान माना. कहानियां चल पड़ीं कि एक दिन हाइया सोफ़िया ईसाइयों के पास वापस लौटेगा. कि एक दिन यहां फिर से चर्च की घंटियां बजेंगी. एक दिन ईसाइयों का सम्मान उनके पास फिर वापस लौटेगा.

मध्यकाल बीता. दुनिया पहुंची 20वीं सदी में. काफी हिचकोले खाने के बाद ऑटोमन साम्राज्य बेहद जर्जर हो गया था. लोग उसे यूरोप का बीमार आदमी कहते थे. इसी बैकग्राउंड में आया 1914 का साल. जब पहले विश्व युद्ध की शुरुआत हुई. इस युद्ध में ऑटोमन साम्राज्य जर्मनी वाले ग्रुप में चला गया. उसने रूसी बंदरगाहों पर सप्राइज़ अटैक पर किया. रूस ने भी जवाबी जंग छेड़ दी. युद्ध में रूस के साथी ब्रिटेन और फ्रांस भी ऑटोमन साम्राज्य के खिलाफ उतर गए. 1918 में फर्स्ट वर्ल्ड वॉर ख़त्म हुआ. ऑटोमन साम्राज्य और उसके गुट की हार हुई. विजेता ब्रिटेन, फ्रांस, ग्रीस और रूस ने ऑटोमन साम्राज्य के ज़्यादातर हिस्सों को आपस में बांट लिया. इसके साथ ही ऑटोमन साम्राज्य की राजशाही के दिन भी लद गए. यहां बदलाव की प्रक्रिया शुरू हुई. इसी बदलाव के तहत 1922 में सुल्तान की पदवी ख़त्म कर दी गई. 29 अक्टूबर, 1923 को गठन हुआ रिपब्लिक ऑफ टर्की का. इसके राष्ट्रपति बने मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क. अतातुर्क ने तुर्की को बनाया एक सेकुलर स्टेट.

1923 से 1938 तक राष्ट्रपति रहे अतातुर्क ने लिखा हाइया सोफ़िया उर्फ़ अया सोफ़िया का नया चैप्टर. अपने सेकुलर आदर्शों पर चलते हुए अतातुर्क ने इसका धार्मिक करेक्टर ख़त्म कर दिया. अब हाइया सोफ़िया न चर्च रहा. न मस्ज़िद. वो बन गया, एक म्यूज़ियम. अतातुर्क के इस फैसले को कट्टर मुसलमानों ने बड़ा नापसंद किया. लेकिन बाकी दुनिया, ख़ासकर पश्चिमी मुल्कों ने इसे ख़ूब सराहा. ये इमारत बन गई सेकुलर तुर्की की सबसे बड़ी पहचान. उसका सबसे बड़ा प्रतीक.

अब फिर से दबाते हैं फॉरवर्ड बटन. आपको लेकर चलते हैं साल 2002 में. क्या हुआ था इस बरस? इस साल तुर्की की राष्ट्रीय सत्ता में एंट्री हुई एक कन्ज़र्वेटिव इस्लामिक पार्टी की. इसका नाम था- जस्टिस ऐंड डिवेलपमेंट पार्टी. शॉर्ट में लोग इसको AK पार्टी कहते हैं. इस पार्टी के मुखिया थे- रिसेप तैयप एर्दोगान की. वो बने तुर्की के प्रधानमंत्री. 11 साल तक PM रहने के बाद अगस्त 2014 में एर्दोगान बने तुर्की के राष्ट्रपति.

एर्दोगान का झुकाव है, तुर्की के इस्लामिक अतीत की तरफ. और उनकी उसी पॉलिटिक्स का हिस्सा है- हाइया सोफ़िया. एर्दोगान ने कई बार हाइया सोफ़िया को दोबारा मस्जिद बनाने की बात कही. लेकिन इसका सबसे मज़बूत संकेत दिया उन्होंने मई 2020 में. क्या हुआ इस महीने? इस महीने की 29 तारीख़ को हुआ एक ख़ास कार्यक्रम. कार्यक्रम का उपलक्ष्य था, कॉन्स्टेनटिनोपोल पर मुस्लिम सेना के कब्ज़े की 567वीं सालगिरह. इस सालगिरह पर एक और ख़ास बात हुई. इस दिन हाइया सोफ़िया के भीतर बैठे एक इमाम साहब. एक कालीन जड़े मंच के ऊपर. उन्होंने अपने सामने खोली क़ुरान और पढ़ने लगे. वो क़ुरान के उस हिस्से को पढ़ रहे थे, जिसे कहते हैं अल-फ़तह सूरा. यानी, जीत के उपलक्ष्य में पढ़ी जाने वाली पंक्तियां. इस सूरा का बैकग्राउंड है 628 में हुई मक्का और मदीना के बीच की संधि.

1923 में म्यूज़ियम बनाए जाने के बाद ये पहली बार था, जब हाइया सोफ़िया के भीतर इस तरह क़ुरान पाठ हुआ. इससे ग्रीस भड़क गया. ग्रीस, जो ख़ुद को बेजेन्टाइन साम्राज्य का उत्तराधिकारी मानता है. वही बेजेन्टाइन साम्राज्य, जिसके हाथ से निकलकर ऑटोमन्स के पास गई थी हाइया सोफ़िया. ग्रीस के विदेश विभाग ने कहा कि तुर्की के इस कदम को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. इसपर एर्दोगान ने ग्रीस को डांट पिला दी. ग्रीस से पूछा, तुर्की को तुम चलाते हो कि हम.

अब ये मामला तुर्की की कोर्ट में पहुंचा दिया गया है. वहां की एक अडमिनिस्ट्रेटिव कोर्ट ये विचार कर रही है कि क्या हाइया सोफ़िया को फिर से मस्जिद बना दिया जाए? इस मामले में दो हफ़्ते के भीतर अदालत अपना फैसला सुना देगी. और इस फैसले से लैस एर्दोगान उठाएंगे अपना फाइनल कदम.

इस मामले पर बाकी देशों की क्या प्रतिक्रिया आई है? पहली प्रतिक्रिया बताते हैं अमेरिका की. इसके सेक्रेटरी ऑफ स्टेट हैं माइक पॉम्पिओ. उन्होंने तुर्की से कहा कि वो सेकुलरिज़म का ख़याल रखे. दूसरे धर्मों की भावनाओं का सम्मान करे. हाइया सोफ़िया को म्यूज़ियम ही रहने दे. दूसरी प्रतिक्रिया बताते हैं रूस की. उसने भी हाइया सोफ़िया का दर्जा बदलने पर आपत्ति जताई है. रूस के डेप्युटी विदेश मंत्री हैं सेरेगी वेरशिनिन. उन्होंने उम्मीद जताई कि तुर्की हाइया सोफ़िया के अंतरराष्ट्रीय महत्व को ध्यान में रखकर ही कोई फैसला लेगा. ये मसला यूरोपियन यूनियन में भी उठा है. यूनेस्को ने भी चिट्ठी भेजकर इसपर आपत्ति जताई है. इसके अलावा कई बड़े ऑर्थोडॉक्स चर्चों ने भी बयान दिया है. इन बयानों का सारांश ये है कि हाइया सोफ़िया के स्टेटस में किया गया बदलाव पूरे ईसाई समुदाय के लिए ख़तरा माना जाएगा. इससे दुनियाभर में ईसाइयों और मुस्लिमों के बीच खाई गहरी हो जाएगी.

ये थीं बाहरी प्रतिक्रियाएं. तुर्की के अंदर लोग क्या कह रहे हैं? लोग इसे पॉलिटिक्स से जोड़ रहे हैं. उनके मुताबिक, ये एर्दोगान की हिस्ट्री रही है. जब भी सपोर्ट बेस कम हुआ, उन्होंने हाइया सोफ़िया को मस्जिद बनाने की बात उठा दी. ताकि राष्ट्रवादी भावनाएं भड़कें. लोगों के भीतर का धर्म जोर पकड़े. कई जानकारों का कहना है कि एर्दोगान ये मसला उठाकर अपनी नाकामियों से ध्यान भटकाना चाहते हैं. उनका सपोर्ट बेस लगातार घट रहा है. कोरोना के कारण हालात और ख़राब हुए हैं. ऐसे में अपने लोगों पर ध्यान देने की बजाय एर्दोगान ने तुर्की को लीबियन युद्ध में धकेल दिया है.

एर्दोगान के तानाशाही रवैये पर भी लोगों को शिकायत है. 2016 में उनका तख़्तापलट करने की कोशिश भी हुई. तख़्तापलट नाकाम रहा और एर्दोगान पहले से ज़्यादा सख़्त हो गए. उन्होंने राष्ट्रपति की शक्तियां बढ़वा लीं. 50 हज़ार से ऊपर लोगों को हिरासत में लिया गया. इनमें पत्रकार, वकील, पुलिस अधिकारी, नेता, प्रफेसर, सैनिक, नाबालिग सब शामिल थे. ख़बरों के मुताबिक, अपनी सत्ता मज़बूत करने के लिए एर्दोगान प्रशासन ने करीब डेढ़ लाख अधिकारियों को नौकरी से निकाल दिया.

अब एक बार फिर लौटते हैं हाइया सोफ़िया पर? इसका क्या होगा, ये तो अदालत का फैसला ही बताएगा. मगर फिलहाल तो एर्दोगान ने इसे उग्र राष्ट्रवाद का मुद्दा बना दिया है. वो दूसरे देशों की प्रतिक्रिया को तुर्की के आंतरिक मामलों में दखलंदाजी बता रहे हैं.

(दा लल्लनटॉप से साभार)

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