ब्रिगेडियर मौहम्मद उस्मान: जिसे पाक आर्मी चीफ बनने का था ऑफर, वो भारत के लिए हुआ शहीद

नई दिल्ली :- उस वक्त मोहम्मद अली जिन्ना नहीं जानते थे कि यही ऑफिसर कश्मीर पर कब्जे की उनकी साजिश को मिट्टी में मिला देगा. जिन्ना की साजिश को कैसे मोहम्मद उस्मान ने चूर-चूर कर दिया, ये बताने से पहले हम आपको बताना चाहेंगे कि भारत माता के इस सपूत मोहम्मद उस्मान का आज जन्मदिन है. जिन्ना के प्लान को फेल करने वाले ब्रिगेडियर उस्मान। ‘नौशेरा के शेर’ को हिन्दुस्तान ने किया याद – भारत मां के जिस सपूत को नेहरू ने दी अंतिम विदाई।

मुल्क तक्सीम होने की तारीख तय हो चुकी थी. पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की नजर भारत के हर अनमोल खजाने पर थी, और वो सभी में पाकिस्तान का हिस्सा चाहते थे. भारत के बरक्स पाकिस्तान को बराबरी में खड़ा करने की जिद में जिन्ना हर चीज का बंटवारा करने पर तुले थे ।

ब्रिटिश इंडिया की सैन्य टुकड़ियों को भी भारत और पाकिस्तान के बीच बांटा जा रहा था. इसी सिलसिले में नंबर आया बलूच रेजिमेंट का. बलूच रेजिमेंट के ज्यादा अफसर मुस्लिम थे और वे पाकिस्तान में शामिल हो रहे थे, चूंकि देश का बंटवारा ही धर्म के आधार पर हुआ था इसलिए ये स्वभाविक भी था।

लेकिन एक आर्मी अफसर था जो इस धारा के विपरीत जा रहा था. इस ऑफिसर का नाम था ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान. मोहम्मद उस्मान का ये फैसला जिन्ना को खटक रहा था. वे उनकी काबिलियत और वीरता से परिचित थे. उस्मान द्वितीय विश्व युद्ध में बर्मा में अपनी सेवाएं दे चुके थे. मोहम्मद उस्मान में उन्हें पाकिस्तान का नायक नजर आ रहा था. लिहाजा वे उन्हें किसी भी तरह से पाकिस्तान ले जाना चाहते थे. लेकिन मोहम्मद उस्मान तो किसी और ही मिट्टी के बने थे।

‘पाकिस्तान आ जाओ आर्मी चीफ बना दूंगा’
मोहम्मद अली जिन्ना ने उन्हें मजहब का वास्ता दिया और उनसे पाकिस्तान में आने को कहा, लेकिन मोहम्मद उस्मान ने उनके इस ऑफर को खारिज कर दिया. जिन्ना ने उन्हें दूसरा ऑफर दिया, और भी ज्यादा आकर्षक और लुभाने वाला. जिन्ना ने मोहम्मद उस्मान से खुद कहा, ‘पाकिस्तान आ जाओ मैं तुम्हें आर्मी चीफ बना दूंगा.’ इस पर मोहम्मद उस्मान का जवाब था, मैं भारत में जन्मा हूं और इसी जमीन पर मैं आखिरी सांस लूंगा. जिन्ना का अपना जवाब मिल चुका था.

आज मोहम्मद उस्मान का जन्मदिन
उस वक्त जिन्ना नहीं जानते थे कि यही ऑफिसर कश्मीर पर कब्जे की उनकी साजिश को मिट्टी में मिला देगा. जिन्ना की साजिश को कैसे मोहम्मद उस्मान ने चूर-चूर कर दिया ये बताने से पहले हम आपको बताना चाहेंगे कि भारत माता के इस सपूत मोहम्मद उस्मान का आज (बुधवार) जन्मदिन है।

आजमगढ़ में हुई पैदाइश
मोहम्मद उस्मान की पैदाइश अविभाजित भारत के उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद में 15 जुलाई 1912 में हुई थी. उनके पिता मोहम्मद फारूक खुनाम्बिर पुलिस अफसर थे. उनकी मां का नाम जमीलन बीबी था. उनके पिता चाहते थे कि उनका बेटा सिविल सर्विस में जाए, लेकिन मोहम्मद उस्मान ने सेना को तरजीह दी।

बच्चे को बचाने कुएं में लगाई छलांग
मोहम्मद उस्मान बचपन से ही दिलेर और बहादुर थे. वे 12 साल के रहे होंगे, जब एक बच्चा कुएं में गिर गया था. लोग मदद के लिए चीख पुकार मचा ही रखे थे कि उस्मान ने कुएं में छलांग लगा दी और कुछ देर में बच्चे को लेकर कुएं से बाहर निकले. इस घटना ने कुछ कुछ उनके करियर की दिशा तय कर दी थी।

रॉयल मिलिट्री अकादमी सैंडहर्स्ट इंग्लैंड में सेना की ट्रेनिंग
गुलाम भारत में एक सामान्य भारतीय के लिए सेना में अफसर बनना आसान नहीं था. इसमें कई बाधाएं थीं. मोहम्मद उस्मान ने रॉयल मिलिट्री अकादमी सैंडहर्स्ट के लिए अप्लाई किया. 1932 में वे इंग्लैड गए. इस अकादमी की परीक्षा काफी चुनौतीपूर्ण थी, लेकिन मोहम्मद उस्मान ने लगन से तैयारी और 1 फरवरी 1934 को सैंडहर्स्ट से पास हुए.
1935 में ब्रिटिश भारत आए तो उनकी नियुक्ति बलूच रेजिमेंट की 5वीं बटालियन में हुई. ब्रिटिश भारत में वे कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते चले गए. 30 अप्रैल 1936 को उन्हें लेफ्टिनेंट की रैंक पर प्रमोशन मिला. 1941 में कैप्टन बने. 1944 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने ब्रिटिश फौज की ओर से बर्मा में सेवाएं दी. 27 सितंबर 1945 को लंदन गैजेट में कार्यवाहक मेजर के तौर पर उनके नाम का उल्लेख किया गया।

मोहम्मद उस्मान ने 10वीं बलूच रेजिमेंट की 14वीं बलाटियन की कमान अप्रैल 1945 से अप्रैल 1946 तक संभाली. इसी दौरान जिन्ना उनके पास पाकिस्तान चलने का ऑफर लेकर आए थे. बंटवारे के बाद जब बलूच रेजिमेंट पाकिस्तान में चली गई तो मोहम्मद उस्मान का ट्रांसफर डोगरा रेजिमेंट में कर दिया गया. कहा जाता है कि डोगरा रेजिमेंट में अपने साथी सैनिकों की भावनाओं का ख्याल रखते हुए मोहम्मद उस्मान शाकाहारी हो गए थे,

बंटवारे के दौरान कश्मीर को हासिल न कर पाने की टीस पाकिस्तान के मन में हमेशा से थी. पाकिस्तान ने 1947 में कबायली घुसपैठियों को जम्मू-कश्मीर की रियासत में भेजा. पाकिस्तान चाहता था जम्मू-कश्मीर पर कब्जा किया जाए और पाकिस्तान में उसका विलय किया जाए.

मोहम्मद उस्मान उस वक्त 50 पैरा ब्रिगेड के कमांडर थे. इस ब्रिगेड को रणभूमि में कठिन चुनौतियों को पूरा करने का जिम्मा दिया जाता है. मोहम्मद जम्मू-कश्मीर में तैनात थे और उन्हें नौशेरा की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी।

जनवरी-फरवरी 1948 में मोहम्मद उस्मान अपने सैनिकों के साथ नौशेरा में तैनात थे. पाकिस्तान लगातार कबायली घुसपैठियों को जम्मू-कश्मीर भेज रहा था. बता दें कि उस वक्त भारत मात्र 5 महीने पहले ही आजाद हुआ था. युद्ध की तैयारी नहीं थी, सैन्य-साजो सामान बिखरे हुए थे. संसाधनों की कमी थी, लेकिन उस्मान जम्मू-कश्मीर की रक्षा का प्रण उठा चुके थे।

इसी दौरान एक वक्त 5000 हजार कबायली नौशेरा में आ चुके थे. वे मस्जिद की आड़ लेकर भारतीय सेना पर फायरिंग कर रहे थे. भारतीय सेना मस्जिद होने की वजह से कबायलियों पर जवाबी फायरिंग करने से हिचकिचा रही थी. इस दौरान ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान खुद सामने आए और कबायलियों पर पहली गोली चलाई. इसी के साथ भारतीय सैनिकों ने घनघोर बदले की कार्रवाई शुरू कर दी।

नौशेरा का शेर की उपाधि
इस लड़ाई में दुश्मन बड़ी तादाद में थे जबकि भारतीय सैनिक उनके मुकाबले कम थे. बावजूद इसके दुश्मन को काफी क्षति पहुंची. इस हमले में सिर्फ 22 भारतीय सैनिक शहीद हुए और 102 जख्मी हुए, जबकि दुश्मन के करीब 1000 लोग मारे गए और 1000 जख्मी हुए. इस दिलेरी भरे अभियान की वजह से उनको नौशेरा का शेर कहकर पुकारा जाने लगा।

इस हार से पाकिस्तानी एकदम बौखला गए. इस वक्त ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान की उम्र 36 साल भी पूरी नहीं हुई थी और वे एक पूरी ब्रिगेड संभाल रहे थे. मई 1948 में पाकिस्तान ने अपनी रेगुलर आर्मी को जम्मू-कश्मीर में भेज दिया. उस वक्त ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान नौशेरा- झांगर में तैनात थे. यहां पर पाकिस्तान ने भयंकर गोलीबारी और शेलिंग शुरू कर दी।

ये आखिरी लड़ाई होने वाली थी. इस जंग से पहले मोहम्मद उस्मान ने अपनी टुकड़ी को आदेश जारी किया जो भारतीय सेना के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया. इस आदेश में कहा गया था कि इससे अच्छी मृत्यु कहां मिलेगी कि वीर योद्धा अपने पिता के भस्म और अपने देवस्थलों की रक्षा करते हुए होम हो जाएं।

36वें जन्मदिन से 12 दिन पहले हुए शहीद
इस बाद भारत की पूरी सेना सैलाब बनकर पाकिस्तान पर टूट पड़ी. भयंकर लडाई हुई. पाकिस्तान को कुछ समझ में ही नहीं आया कि अचानक भारतीय सेना इतनी ताकतवर होकर युद्ध कैसे करने लगी है. ब्रिगेडियर उस्मान खुद युद्ध का नेतृत्व कर रहे थे. लेकिन…3 जुलाई 1948 के दिन एक तोप का गोला ब्रिगेडियर उस्मान के पास आकर गिरा और इसकी चपेट में वे आ गए. अपने 36 वें जन्मदिन के 12 दिन पहले ब्रिगेडियर उस्मान यूद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए. लेकिन तबतक भारत झांगर पर कब्जा कर चुका था. ब्रिगेडियर उस्मान को उनके जोशीले नेतृत्व और साहस के लिए मरणोपरांत ‘महावीर चक्र’ से पुरस्कृत किया गया।

ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान की आखिरी सफर कब्रिस्तान जाने में खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू शामिल हुए. उनका अंतिम संस्कार दिल्ली के जामिया मिल्लिया में किया गया.
(आजतक से साभार)

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