स’द्दाम हुसैन ने तीन साल तक अपना 26 लीटर ख़ू’न देकर लिखवाई थी “कुरान मजीद”

नई दुनिया : सद्दाम हुसैन को बड़े-बड़े महल बनाने के अलावा बड़ी-बड़ी मस्जिदें बनवाने का भी शौक था. एक इसी तरह की मस्जिद उन्होंने मध्य बग़दाद में बनवाई थी जिसे ‘ उम्म अल मारीक’ नाम दिया गया था. इसको ख़ास तौर से 2001 में सद्दाम हुसैन की सालगिरह के लिए बनवाया गया था. ख़ास बात ये थी कि इसकी मीनारें स्कड मि’साइल की शक्ल की थीं.ये वही मिसाइलें थीं जिन्हें सद्दाम हुसैन ने खाड़ी यु’द्ध के दौरान इसराइल पर द’ग़वाया था. ऑ’परेशन डेस’र्ट स्टॉ’र्म’ जो 43 दिनों तक चला था, की याद दिलाने के लिए इन मीनारों की ऊँचाई 43 मीटर रखी गई थी.

सद्दाम हुसैन की जीवनी लिखने वाले कॉन कफ़लिन लिखते हैं, “सद्दाम की बनवाई एक मस्जिद में सद्दाम के ख़ून से लिखी गई एक कुरान रखी हुई है. उसके सभी 605 पन्नों को लोगों को दिखाने के लिए एक शीशे के केस में रखा गया है. मस्जिद के मौलवी का कहना है कि इसके लिए सद्दाम ने तीन सालों तक अपना 26 लीटर ख़ून दिया था.”

सद्दाम पर एक और किताब, ‘सद्दाम हुसैन, द पॉलिटिक्स ऑफ़ रिवेंज’ लिखने वाले सैद अबूरिश का मानना है कि सद्दाम की बड़ी-बड़ी इमारतें और मस्जिदें बनाने की वजह तिकरित में बिताया उनका बचपन था, जहाँ उनके परिवार के लिए उनके लिए एक जूता तक ख़रीदने के लिए भी पैसे नहीं होते थे.

दिलचस्प बात ये है कि सद्दाम अपने जिस भी महल में सोते थे, उन्हें सिर्फ़ कुछ घंटों की ही नींद लेनी होती थी. वो अक्सर सुबह तीन बजे तैरने के लिए उठ जाया करते थे. इराक़ जैसे रेगिस्तानी मुल्क में पहले पानी धन और ताक़त का प्रतीक हुआ करता था और आज भी है. इसलिए सद्दाम के हर महल में फव्वारों और स्वीमिंग पूल की भरमार रहती थी. कफ़लिन लिखते हैं कि सद्दाम को स्लिप डिस्क की बीमारी थी. उनके डाक्टरों ने उन्हें सलाह दी थी कि इसका सबसे अच्छा इलाज है कि वो खूब चहलकदमी और तैराकी करें.

सद्दाम हुसैन के सारे स्वीमिंग पूलों की बहुत बारीकी से देखभाल की जाती थी. उनका तापमान नियंत्रित किया जाता था और ये भी सुनिश्चित किया जाता था कि पानी में ज़हर तो नहीं मिला दिया गया है ।

सद्दाम पर एक और किताब लिखने वाले अमाज़िया बरम लिखते हैं, “ये देखते हुए कि सद्दाम के शासन के कई दुश्मनों को थेलियम के ज़हर से मारा गया था, सद्दाम को अंदर ही अंदर इस बात का डर सताता था कि कहीं उन्हें भी कोई ज़ह’र दे कर न मा’र दे. हफ़्ते में दो बार उनके बग़दाद के महल में ताज़ी मछली, केकड़े, झींगे और बकरे और मुर्गे के गोश्त की खेप भिजवाई जाती थी.”

वो आगे लिखते हैं, “राष्ट्पति के महल में जाने से पहले परमाणु वैज्ञानिक उनका परीक्षण कर इस बात की जाँच करते थे कि कहीं इनमें रे’डिये’शन या ज़’हर तो नहीं है.”

किताब में लिखा है, ”सद्दाम के महलों की संख्या 20 के करीब थी. उनमें कर्मचारी हर समय मौजूद रहते थे और सभी महलों में तीन वक्त का खाना बना करता था, चाहे उनमे सद्दाम रह रहे हों या नहीं.”

सद्दाम की कमज़ोरी थी कि वो हमेशा बहुत अच्छा दिखना चाहते थे. इसलिए बाद में उन्होंने परंपरागत ज़ैतूनी रंग की सैनिक वर्दी पहनना छोड़ कर सूट पहनना शुरू कर दिया था. ऐसा उन्होंने तत्कालीन संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफ़ी अन्नान की सलाह पर किया था जिनका मानना था कि सूट पहनने से विश्व नेता के रूप में उनकी छवि बेहतर होगी.

सद्दाम हमेशा अपने बालों में ख़ि’ज़ाब लगाते थे और लोगों के सामने पढ़ने वाला चश्मा लगा कर कभी सामने नहीं आते थे. जब वो भाषण देते थे तो उनके सामने कागज़ पर बड़े बड़े शब्द लिखे होते थे- एक पन्ने पर सिर्फ़ दो या तीन लाइनें. सद्दाम इस बाद का भी ख़्याल रखते थे कि चलते समय कुछ कदमों से ज़्यादा उनकी फ़िल्म न उतारी जाए ।

कॉन कफ़लिन लिखते हैं कि ‘सद्दा’म दिन में कई बार छोटी छोटी झपकियाँ ले लिया करते थे. कई बार तो ऐसा होता था कि वो बीच बैठक से उठ कर बगल वाले कमरे में चले जाते थे और एक छोटी नींद ले कर आधे घंटे बाद तरोताज़ा निकलते थे.’

सद्दाम को टेलीविज़न देखने का भी शौक था और वो ज़्यादातर सीएनएन, बीबीसी और अलजज़ीरा देखा करते थे.उन्हें रोमांचक अंग्रेज़ी थ्रिलर्स देखने का भी शौक था और अंग्रेज़ी फ़िल्म ‘द डे ऑफ़ द जैकाल’ उनकी पसंदीदा फ़िल्म थी ।

सन 2002 का शुरुआत में सद्दाम ने कैबिनेट बैठक के दौरान अपने एक मंत्री को अपनी घड़ी देखते हुए देख लिया. जब बैठक समाप्त हो गई तो उन्होंने उस मंत्री को रुकने के लिए कहा. उन्होंने उनसे पूछा, ‘क्या आपको बहुत जल्दी है?’ जब उस मंत्री ने कहा कि ऐसी बात नहीं है तो सद्दाम ने उन्हें डांटते हुए कहा कि ऐसा कर आपने मेरा अपमान किया है.

कफ़लिन लिखते हैं, “सद्दाम ने आदेश दिया कि उन मंत्री को उसी कमरे में दो दिनों तक कैद रखा जाए. वो मंत्री बैठक कक्ष में दो दिनों तक कैद रहा और उसे लगता रहा कि उसे कभी भी बाहर ले जाकर गोली मारी जा सकती है. आखिर में सद्दाम ने उनके प्राण तो बख्श दिए लेकिन उन्हें अपने पद से हाथ धोना पड़ा.”

सद्दाम के लिए उनके विरोधियों से ज़्यादा उनका खुद का परिवार परेशानी का कारण था और उसमें बहुत बड़ी भूमिका थी उनकी अपनी पत्नी साजिदा के प्रति बेवफ़ाई की. 1988 के आसपास सद्दाम को बहुत बड़े पारिवारिक संकट से गुज़रना पड़ा जब उनके इराकी एयरवेज़ के महा’निदेशक की पत्नी समीरा शाहबंदर से संबं’ध हो गए.

समीरा लंबी थी, हसीन थीं और उनके सुनहरे रंग के बाल भी थे और सबसे बड़ी बात ये थी कि वो शादीशुदा थीं. उसके बहुत सारे कामों में एक काम सद्दाम को दिए जाने वाले भोजन को खा कर देखना भी था कि उसमें कहीं ज़’हर तो नहीं मिलाया गया था.

सद्दाम का मानना था कि उनका रसोइया उनके खाने में इसलिए कभी ज़’हर नहीं मिलाएगा क्योंकि उसके खुद के बेटे को उसे पहले चखना होता था.

ऐसा भी कहा जाता है कि (इसमें सच्चाई है या नही)
एक लेखक लिखते हैं, “कई सालों तक राष्ट्रपति महल में काम करने वाले एक अधिकारी ने मुझे बताया था कि सद्दाम को शादीशुदा औरतों से सं’बंध बनाना ख़ासतौर से पसंद था. ये उनके पतियों को ज़ली’ल करने का उनका अपना तरीका हुआ करता था.”

सद्दाम की इस तरह की रंगरेलियों का इंतेज़ाम उनका अंगरक्षक कामेल हना जेनजेन किया करता था. जेनजेन बीस सालों तक सद्दाम का निजी अंगरक्षक था. दिलचस्प बात ये थी कि जेनजेन सद्दाम के रसोइए का बेटा था.

(बी बी सी हिंदी से साभार )

Leave a Reply

Your email address will not be published.